""मेरे मन की आवाज""
मित्रो "पुरोहित" यानी "ब्राह्मण", पुरोहित शब्द वो शब्द हैं जिसे सदियों से राजाओं ,महाराजाओं ने आदर और सम्मान दिया हैं , राजाओं के जमाने में हर काम ब्राह्मण पुरोहित् के बिना अधूरा माना जाता था,
यहाँ तक की राजा का राजतिलक पुरोहित के बिना नही होता था ,
मित्रो मुझे मेरे पूर्वजो पर मान हैं उनके पुण्यकर्मो और आशार विचार से उनको (पुरोहित) राजधर्म में राजा के बराबर या राजा से एक पायदान ऊपर का दर्जा दिया जाता था।
लेकिन आज परिवर्तित होते समय में हम अपने धर्म से भटक गये, पुरोहित कर्म हिन् हो गया, आजका ब्राह्मण नाम के आधार पर पह्साना जाता हैं गुणों के आधार पर नही । कारण यही की आज हम गुण हिन् हो गए,
आजके जमाने में पुरोहित को जब तक नही पहचाना जाता जबतक वो खुद अपना परिशय ना दे,
हा एक बात और मेने नोट की हैं की आज हमारा युवा वर्ग अपनी पह्सान देते समय "पुरोहित" शब्द की जगह अपना उपनाम या गोत्र लगा देते हैं,
जेसे - उदेस,सेवड़,रायगुर, लाफा,दुदावत, हल्सिया, मकोणा वगेरा वगेरा
उदारण के तोर पर मै केवल "मुकेश दुदावत" लिखू तो मुझे पहचानना बहुत कठिन हो जाएगा की मै पुरोहित ब्राह्मण हूँ या और कोई जाती से।इसलिए हमे हमारी पहचान बनाए रखने के लिए अपने नाम के आगे "पुरोहित"शब्द लिखना अति आवश्य हैं।
मित्रो यस्क मुनि की निरुक्त के अनुसार - ब्रह्म जानाति ब्राह्मण पुरोहितं- ब्राह्मण पुरोहित वह है जो ब्रह्म अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान को जानता है, अतः ब्राह्मण का अर्थ है - "ईश्वर ज्ञाता"
प्रिय मित्रो ब्राह्मण होने के क्या गुण हैं हमारे पास, गुरुप में एसे कितने मित्र हैं जो ब्राह्मण धर्म का पालन करते हैं,
मित्रो इस गुरुप में कितने मेंबर हैं जो नियमित जनेहूँ, शिखा, और तिलक धारण करते हैं?
मित्रो मुझे बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा हैं की ये सब गुण ब्राह्मणों में अब नहीं बचे, आज पुरोहित इस परिवर्तित प्रणाली और धन की लालसा में, इतना कर्म हिन् और गोण हो गया हैं की उसकी मुख्य पहचान शिखा,जनेहु और तिलक को धारण करने में भी शर्म महसूस करता हैं।
हां फेसन के नाम पर लडकियों से भी लम्बे लम्बे बाल रखने में उनको कोई शर्म नहीं आती। इस पाश्च्यात्य संस्कृति से बहार निकलो, अपने धर्म को पहचानो।
मेरा सभी पुरोहित समाज बन्धुओ से आग्रह और अनुरोध हैं की अपनी पहचान बनाए रखने के लीये अपने जीवन प्रणाली में मुख्य तिन बातो का समावेष अवश्य करे-
1- शिखा धारण करना
2 -तिलक लगाना
3-जनेहूँ धारण करना
धन्यवाद...जय गुरुदेव..
मित्रो "पुरोहित" यानी "ब्राह्मण", पुरोहित शब्द वो शब्द हैं जिसे सदियों से राजाओं ,महाराजाओं ने आदर और सम्मान दिया हैं , राजाओं के जमाने में हर काम ब्राह्मण पुरोहित् के बिना अधूरा माना जाता था,
यहाँ तक की राजा का राजतिलक पुरोहित के बिना नही होता था ,
मित्रो मुझे मेरे पूर्वजो पर मान हैं उनके पुण्यकर्मो और आशार विचार से उनको (पुरोहित) राजधर्म में राजा के बराबर या राजा से एक पायदान ऊपर का दर्जा दिया जाता था।
लेकिन आज परिवर्तित होते समय में हम अपने धर्म से भटक गये, पुरोहित कर्म हिन् हो गया, आजका ब्राह्मण नाम के आधार पर पह्साना जाता हैं गुणों के आधार पर नही । कारण यही की आज हम गुण हिन् हो गए,
आजके जमाने में पुरोहित को जब तक नही पहचाना जाता जबतक वो खुद अपना परिशय ना दे,
हा एक बात और मेने नोट की हैं की आज हमारा युवा वर्ग अपनी पह्सान देते समय "पुरोहित" शब्द की जगह अपना उपनाम या गोत्र लगा देते हैं,
जेसे - उदेस,सेवड़,रायगुर, लाफा,दुदावत, हल्सिया, मकोणा वगेरा वगेरा
उदारण के तोर पर मै केवल "मुकेश दुदावत" लिखू तो मुझे पहचानना बहुत कठिन हो जाएगा की मै पुरोहित ब्राह्मण हूँ या और कोई जाती से।इसलिए हमे हमारी पहचान बनाए रखने के लिए अपने नाम के आगे "पुरोहित"शब्द लिखना अति आवश्य हैं।
मित्रो यस्क मुनि की निरुक्त के अनुसार - ब्रह्म जानाति ब्राह्मण पुरोहितं- ब्राह्मण पुरोहित वह है जो ब्रह्म अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान को जानता है, अतः ब्राह्मण का अर्थ है - "ईश्वर ज्ञाता"
प्रिय मित्रो ब्राह्मण होने के क्या गुण हैं हमारे पास, गुरुप में एसे कितने मित्र हैं जो ब्राह्मण धर्म का पालन करते हैं,
मित्रो इस गुरुप में कितने मेंबर हैं जो नियमित जनेहूँ, शिखा, और तिलक धारण करते हैं?
मित्रो मुझे बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा हैं की ये सब गुण ब्राह्मणों में अब नहीं बचे, आज पुरोहित इस परिवर्तित प्रणाली और धन की लालसा में, इतना कर्म हिन् और गोण हो गया हैं की उसकी मुख्य पहचान शिखा,जनेहु और तिलक को धारण करने में भी शर्म महसूस करता हैं।
हां फेसन के नाम पर लडकियों से भी लम्बे लम्बे बाल रखने में उनको कोई शर्म नहीं आती। इस पाश्च्यात्य संस्कृति से बहार निकलो, अपने धर्म को पहचानो।
मेरा सभी पुरोहित समाज बन्धुओ से आग्रह और अनुरोध हैं की अपनी पहचान बनाए रखने के लीये अपने जीवन प्रणाली में मुख्य तिन बातो का समावेष अवश्य करे-
1- शिखा धारण करना
2 -तिलक लगाना
3-जनेहूँ धारण करना
धन्यवाद...जय गुरुदेव..
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